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कुछ डर ऐसे होते हैं जो केवल सोचने भर से रोंगटे खड़े कर देते हैं। दुर्घटना का डर भी कुछ ऐसा ही है। जब भी कभी किसी हादसे के बारे में सोचती हूँ, मन में एक अजीब-सी कंपकंपी दौड़ जाती है।
एक बार की बात है, मैं अपनी माँ के साथ कहीं जा रही थी। गाड़ी सामान्य गति से ही चल रही थी, शायद थोड़ी तेज़ होगी। तभी एक मोड़ के पास से अचानक एक तेज़ रफ्तार कार हमारी गाड़ी के बिल्कुल करीब से निकल गई। ऐसा लगा मानो बस कुछ इंच का ही फासला था। मेरे तो उसी क्षण रोंगटे खड़े हो गए। डर के मारे दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि कुछ पल के लिए जैसे साँसें ही थम गई हों।
साथ बैठी माँ की ओर देखा तो उनकी आँखों में आँसू थे। शायद उन्हें कुछ साल पहले हुए उस भयानक हादसे की याद आ गई थी, जिसने हमारी पूरी ज़िंदगी बदलकर रख दी थी।
आज एक बार फिर कुछ वैसा ही मेरे साथ हुआ।
मेरी गाड़ी लगभग 70 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही थी। अचानक रास्ते में कहीं निर्माण कार्य चल रहा था और वहाँ मिट्टी का एक अस्थायी स्पीड ब्रेकर बना हुआ था। न जाने वह मुझे समय रहते क्यों दिखाई नहीं दिया। गाड़ी जैसे ही उसके ऊपर से गुज़री, इतनी उछली कि मेरा पूरा शरीर डर से काँप उठा।
उस एक पल में न जाने कितने ख्याल मन में आ गए। दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं और कुछ देर तक उस झटके का एहसास मन में बना रहा।
कहते हैं कि समय हर घाव भर देता है, लेकिन शायद कुछ हादसों के निशान मन में हमेशा रह जाते हैं। कभी-कभी कोई छोटी-सी घटना भी पुराने डर को फिर से जगा देती है।
बस, अब ज़िंदगी में उस एहसास को दोबारा कभी महसूस नहीं करना चाहती। सचमुच, सुरक्षित घर पहुँच जाना भी किसी नेमत से कम नहीं है।
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