बात 1989 की है। घर में विवाह की तैयारियाँ बड़े ही ज़ोर-शोर से चल रही थीं। विवाह से संबंधित सभी वस्तुओं की खरीदारी हो चुकी थी। घर का सबसे छोटा सदस्य होने के कारण अंतिम विवाह कार्य में भी माँ का उत्साह कम नहीं था। उम्र के उस पड़ाव पर भी माँ तन और मन से बिल्कुल थकी नहीं थीं। विवाह के पश्चात बेटी को दूसरे शहर में गृहस्थी बसाने में किसी भी दिक्कत का सामना न करना पड़े, इसलिए माँ ने एक-एक वस्तु की खरीदारी बड़ी सावधानीपूर्वक अपनी निगरानी में की थी।
मेरे विवाह के बीच में पाँच साल का लंबा अंतराल था। इसलिए उनमें उत्साह कुछ अधिक ही था।
विवाह से पंद्रह दिन पूर्व किसी कार्य हेतु मैं और माँ बाज़ार गए। जैसा कि सर्वविदित है, महिलाएँ अथवा लड़कियाँ अपनी खरीदारी से कभी भी संतुष्ट नहीं होतीं। कुछ न कुछ खरीदने के लिए सदैव लालायित रहती हैं। ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ।
दुकान के शोकेस में लटकती एक गहरे नीले रंग की साड़ी मन को भा गई। उस साड़ी पर आसमानी, रानी तथा पीले रंग के धागों से बड़ी ही सुंदर कढ़ाई की हुई थी। उसका पल्लू भी काफी सुंदर बना हुआ था। साथ में किनारे पर रंग-बिरंगे धागों से लटकन जुड़ी हुई थी। देखते ही मन ललचा गया और माँ से उसे लेने की मनुहार की।
हालाँकि मुझे यह ज्ञात था कि इस समय उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसे खरीदना फिजूलखर्ची है। माँ ने बिना किसी इंकार के उसे ले दिया।
आज मैं कुछ अस्वस्थ होने के कारण साड़ी पहनने में असुविधा महसूस करती हूँ। यहाँ तक कि अपनी बेटी के विवाह में भी साड़ी नहीं पहन सकी। अपनी अनेक साड़ियाँ मैं कामवाली मौसी को दे चुकी हूँ। परंतु जब भी उस नीली साड़ी को देने का विचार मन में आता है, तो मन अशांत हो जाता है। अकारण ही दिल भर आता है। उसे अपने से दूर करने का ख्याल ही असहनीय लगता है। एक भावनात्मक लगाव है उस साड़ी से।
इसी भाँति विवाह के एक वर्ष पश्चात माँ ने अपने हाथों से बुनकर एक फिरोज़ी रंग का वी-गले वाला बंद स्वेटर दिया था। आज से लगभग तीस वर्ष पूर्व की बात है। सांसारिक दृष्टि से देखा जाए तो आज के समय में वह स्वेटर मेरे किसी भी उपयोग का नहीं है। परंतु भावनात्मक दृष्टि से वह स्वेटर मेरे लिए अनमोल है।
हर छह महीने बाद, जब सर्दियों के कपड़े उपयोग के लिए निकालने या उन्हें समेटकर रखने के लिए अलमारी खोलती हूँ, तो उस स्वेटर को स्पर्श करती हूँ। मन को अजीब-सा सुकून मिलता है। उसके बुने एक-एक फंदे में माँ के स्नेह को महसूस करती हूँ। उसे किसी को देने के लिए दिल मानता ही नहीं।
मुझे यह ज्ञात है कि कई बुद्धिजीवी पाठक मेरी इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं होंगे। व्यवहारिक दृष्टि से यह सच भी है कि कोई वस्तु किसी गरीब के काम आ जाए, तो उससे बड़ा कोई पुण्य नहीं है। किसी ज़रूरतमंद की कमी की पूर्ति करना सबसे बड़ा परोपकार है।
लेकिन मन इस तर्क को बिल्कुल नहीं मानता। इस पागल मन को कौन समझाए? मन के भावों के समक्ष सारे तर्क बेमानी हैं।
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